मेरा नाम रोहित मल्होत्रा है। उम्र बत्तीस साल। गुड़गांव के एक मिड-साइज़ आईटी फर्म में मैं प्रोजेक्ट लीड कर्ता हूँ। कंपनी में करीब सात साल से हूँ। काम अच्छा चलता है, सैलरी ठीक-ठाक है, फ्लैट भी अपना है सेक्टर 56 में। शादी अभी तक नहीं हुई। दो-तीन गर्लफ्रेंड्स रही हैं, सेक्स भी हुआ है, लेकिन पिछले डेढ़ साल से बॉडी और मन दोनों थोड़े सूखे पड़े थे। ऑफिस-घर-ऑफिस का चक्र।
फिर अप्रैल के पहले हफ्ते में टीम में एक नई लड़की आई। नाम प्रिया राठौर। बाईस-तेईस की लगती थी, लेकिन डॉक्यूमेंट्स में उम्र चौबीस लिखी थी। जयपुर से आई थी, पहले एक छोटे स्टार्टअप में जूनियर डिजाइनर रही। हमारे टीम में यूआई असिस्टेंट के रूप में जॉइन की। मैं उसका डायरेक्ट सुपरवाइजर था।
पहली सुबह जब एचआर उसे मेरे केबिन के बाहर लाया, मैं लैपटॉप से नजर उठाकर देखता रह गया। गोरी-चिट्टी रंगत, गेहुँआ नहीं बिलकुल दूध जैसी सफेदी। चेहरा गोल-मटोल, बड़ी-बड़ी काली आँखें, पतली नाक, होंठ मोटे और गुलाबी। बाल घुंघराले काले, कमर तक। कद साढ़े पाँच फीट के आसपास। सफेद फॉर्मल शर्ट में दो गोल-मटोल स्तन साफ उभर रहे थे। काली स्लिम फिट पैंट जांघों को कसकर पकड़े हुए थी। कमर पतली, गांड गोल और भारी। चलते समय जांघें आपस में रगड़ती थीं।
मैंने हाथ मिलाया। उसकी हथेली नरम और ठंडी थी। आँखें झुकाकर बोली, “सर, गुड मॉर्निंग। मैं प्रिया।” आवाज धीमी, थोड़ी घबराई हुई।
पहले हफ्ते मैंने उसे सिर्फ काम सिखाया। लेकिन नजरें बार-बार उसकी तरफ चली जातीं। जब वो अपने डेस्क पर झुककर डिजाइन देखती, शर्ट आगे से खुलती और गला साफ दिखता। जब वो पानी पीने उठती, गांड हिलती। लंच में वो अकेली बैठ के ही खाती। मैं कभी-कभी पास जाकर पूछता काम के बारे में, वो शर्माती और सिर हिलाती।
दूसरे हफ्ते मैंने नोटिस किया कि वो अक्सर देर तक ऑफिस में रहती। घर पेइंग गेस्ट में रहता था, रूममेट्स शोर करते थे इसलिए वो ओवरटाइम करके शांत माहौल में काम करना पसंद करती। एक शुक्रवार शाम साढ़े सात बज गए थे। बारिश जोरों से हो रही थी। बाकी लोग निकल चुके थे। सिर्फ मैं और वो थे।
मैं उसके डेस्क के पास गया। “प्रिया, आज बहुत लेट हो गया। बारिश भी तेज है। तुम्हारा पीजी दूर है ना?”
वो घबराई। “हाँ सर… ऑटो नहीं मिलेंगे इस टाइम, इसलिए रुकी हुयीं हूँ।”
मैंने कहा, “चलो, मैं ड्रॉप कर देता हूँ। लेकिन पहले मेरे फ्लैट चलो, बारिश थमने तक रुकना। डिनर भी कर लेना।”
वो दो मिनट सोची, फिर धीरे से सिर हिलाया। “ठीक है सर… अगर आपको दिक्कत न हो।”
कार में बैठते समय उसकी जांघ मेरी जांघ से छू गई। दोनों चुप रहे। बारिश की आवाज और वाइपर की आवाज। फ्लैट पहुँचे तो मैंने लाइट जलाई, एसी ऑन किया। छोटा सा दो बीएचके, साफ-सुथरा। मैंने बोला बैठो, मैं डिनर ऑर्डर कर देता हूँ। उसने काली पैंट और सफेद शर्ट में सोफे पर बैठकर चारों तरफ देखा।
मैंने पिज्जा और गारलिक ब्रेड मंगवाई। फ्रिज से दो कोल्ड बियर निकालीं। “पीओगी?” वो झिझकी। “सर… मैं ज्यादा नहीं पीती।” मैंने मुस्कुराकर कहा, “एक-दो से कुछ नहीं होता। आज छुट्टी है कल।” उसने बोतल पकड़ ली।
खाना आया। हमने खाया, बातें कीं। जयपुर, परिवार, कॉलेज। वो बोली कि वो बहुत सिंपल फैमिली से है, पापा सरकारी नौकरी करते हैं, मम्मी हाउसवाइफ। दोस्त कम हैं। बॉयफ्रेंड कभी नहीं रहा। मैंने हल्का मजाक किया, “इतनी प्यारी लड़की और कोई नहीं पट पाया?” वो लाल हो गई और बोली, “सर… ऐसे मत बोलिए।”
तीसरी बियर के बाद उसका चेहरा गुलाबी हो गया था। आँखें चमक रही थीं। वो सोफे पर मेरे थोड़ा करीब खिसक आई थी। मैंने टीवी ऑन किया लेकिन देखा नहीं। बातें गहरी होती गईं। मैंने पूछा, “तुम्हें ऑफिस कैसा लग रहा है?” वो बोली, “अच्छा है… आप अच्छे हैं सर। बाकी लोग थोड़े रूखे हैं।”
मैंने धीरे से अपना हाथ उसके कंधे पर रखा। वो सहम गई लेकिन हटी नहीं। मैंने कहा, “प्रिया, तुम बहुत खूबसूरत हो। पहले दिन से देख रहा हूँ।” वो नीचे देखने लगी। मैंने अपना हाथ उसके बालों में फिराया। फिर गर्दन की तरफ ले गया। उसकी साँस तेज हो गई।
मैंने उसका चेहरा अपनी तरफ घुमाया और होठों पर होठ रख दिए। पहले वो कड़ी रही, फिर धीरे-धीरे होठ खोल दिए। जीभ अंदर गई। वो किलकारी मारने लगी लेकिन आवाज दबाई। मैंने उसका निचला होंठ चूसा। हाथ उसकी पीठ पर ले जाकर शर्ट के अंदर डाला। ब्रा का हुक मिला। एक झटके में खोल दिया।
शर्ट के अंदर हाथ घुमाया तो नंगी पीठ और फिर आगे बढ़कर एक पूरा नरम स्तन मुट्ठी में आ गया। अहह… इतना मुलायम, इतना भारी। निप्पल पहले से ही सख्त था। मैंने उसे उंगली और अंगूठे के बीच मरोड़ा। वो मेरे मुँह में कराह उठी, “सर… अहह… धीरे…”
मैंने शर्ट के बटन खोलने शुरू किए। एक-एक करके। शर्ट खुली तो सफेद ब्रा आधी खुली हुई लटक रही थी। मैंने ब्रा उतारकर फेंक दी। दो गोरे-गोरे, गुलाबी निप्पल वाले स्तन बाहर आ गए। आकार पूरे मुट्ठी भर के, थोड़े भारी नीचे की तरफ। मैंने एक को मुँह में लिया और जोर से चूसा। जीभ निप्पल पर घुमाई, दाँत से हल्के काटे। दूसरा हाथ दूसरे स्तन को मसल रहा था।
प्रिया की कमर उठने लगी। वो मेरे बाल पकड़कर सिर को अपने सीने से चिपकाए हुए थी। “रोहित सर… क्या कर रहे हो… मैं… मैं ऐसे…” मैंने मुँह हटाकर कहा, “बोलो प्रिया, मना करो तो रुक जाऊँगा।” वो चुप रही, सिर्फ साँस ले रही थी। फिर फुसफुसाई, “मत रुको…”
मैंने उसे सोफे पर लिटा दिया। पैंट की चेैन खोली, जिप नीचे की। पैंट और पैंटी एक साथ खींचकर उतार दी। वो पूरी नंगी हो गई। जांघें बंद किए हुए थी। मैंने धीरे से जांघें अलग कीं। बीच में घनी काली झाड़ी। चूत की लिपें गुलाबी और बंद। मैंने दो उंगलियों से लिपें खोलीं तो अंदर से हल्की चमकदार नमी दिखी।
मैंने नाक चूत के पास ले जाकर सूंघा। ताजा, हल्की सी खट्टी-मीठी गंध। जीभ निकालकर एक लंबा चाटा बीच से ऊपर तक लगाया। वो उछल पड़ी, “आह्ह्ह… सर… वहाँ नहीं…” मैंने दोनों जांघें पकड़कर फैलाईं और चूत चाटने लगा। क्लिट को जीभ से दबाने लगा, अंदर थोड़ी जीभ घुसाई। वो दोनों हाथों से सोफे का कपड़ा मरोड़ रही थी। टाँगें काँप रही थीं।
पाँच-सात मिनट चाटने के बाद मैंने एक उंगली अंदर डालने की कोशिश की। मुश्किल से एक पोर घुसी। बहुत टाइट। दूसरी उंगली डालने की कोशिश की तो और टाइट। मैंने सिर उठाकर देखा। “प्रिया… तुम्हारी चूत बहुत कसी हुई है। पहले कभी किसी ने छुआ है?”
वो आँखें बंद किए हुए थी। शर्म से गला सूख गया होगा। धीरे से बोली, “नहीं सर… कभी नहीं… मैं… कुंवारी हूँ।”
मेरा लंड जो पहले से पैंट में तना हुआ था, और सख्त हो गया। मैंने अपने कपड़े उतारे। लंड बाहर निकला — उसने आँखें खोलकर देखा और साँस रोक ली। हाथ बढ़ाकर पकड़ लिया। धीरे-धीरे ऊपर-नीचे करने लगी। “इतना… बड़ा…”
मैं उसके ऊपर चढ़ गया। लंड का सिर उसकी गीली चूत के मुँह पर रखा। रगड़ा। वो तन गई। “सर… दर्द होगा ना… प्लीज धीरे…” मैंने कहा, “धीरे करूँगा। दर्द होगा पहली बार, फिर मजा आएगा। भरोसा रखो।”
मैंने धीरे दबाव दिया। सिर अंदर घुसा। वो चीखने लगी लेकिन मुँह दबा लिया। मैंने और धक्का दिया। दो इंच अंदर गया। बहुत टाइट, जैसे कोई रबर की अंगूठी कस रही हो। फिर एक जोर का धक्का। पूरा लंड अंदर चला गया। उसी समय मुझे गर्म गीलापन और फिर कुछ अलग सा फटा। खून निकला। लाल खून लंड के साथ बाहर आने लगा।
प्रिया जोर से रो पड़ी, “आह्ह्ह दर्द हो रहा है सर… निकल जाओ… बहुत दर्द…” आँखों में आँसू। मैं रुका, अंदर ही रुक गया। चूमा उसके माथे और गालों को। “थोड़ा सह लो जान। सील टूट गई है। अब आराम से होगा।” दो मिनट रुका। फिर धीरे-धीरे बाहर निकाला और फिर अंदर किया। खून और पानी मिलाकर चिकना हो गया था।
दस-बारह धीमे धक्कों के बाद उसकी कराह बदल गई। दर्द वाली नहीं, मजे वाली। वो खुद कमर उठाने लगी। “आह… अब… अब अच्छा लग रहा है… और डालो सर…” मैंने गति बढ़ाई। पेलने लगा। चूत की आवाज आने लगी — चप-चप-चप। स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। मैंने एक स्तन मुँह में लेकर चूसते हुए जोर-जोर से चोदने लगा।
पहली बार वो काँपते हुए झड़ गई। चूत ने लंड को जोर से जकड़ लिया। मैं भी नहीं रुका। और तेज पेलने लगा। पसीना दोनों का। सोफे पर खून के धब्बे पड़ गए। मैंने कहा, “अब निकालूँगा अंदर?” वो बेहोशी में सिर हिलाती रही। मैंने दो और जोर के धक्के मारे और पूरा गरम रस उसकी कुंवारी चूत के अंदर उड़ेल दिया। बहुत सारा, रुक-रुककर।
लंड निकालने पर खून मिला हुआ सफेद पानी बाहर बहने लगा। वो लेटी रही, टाँगें फैली, साँस फूल रही थी। मैंने पानी पिलाया। दस मिनट बाद वो बोली, “सर… मैं थक गई… लेकिन… अच्छा लगा अंत में।”
मैंने उसे उठाकर बेडरूम ले गया। बिस्तर पर लिटाया। खुद उसके पास लेट गया। हाथ उसके पेट पर फिराया, फिर चूत पर। अभी भी गीली और गरम थी। उंगली अंदर डाली तो आसानी से घुस गई अब। दो उंगलियाँ डालकर अंदर घुमाने लगा। वो फिर कराहने लगी।
आधी रात को दूसरी बार चुदाई हुई। इस बार मैंने उसे घोड़ी बनाकर चोदा। गांड ऊपर की, कमर पकड़कर पीछे से पूरा लंड अंदर तक पेलता रहा। उसकी गांड की चर्बी काँपती थी हर धक्के पर। मैंने थूक लगाकर एक उंगली उसकी गांड के छेद में भी घुसाई। वो चिल्लाई लेकिन मना नहीं किया। “सर वो… गंदी जगह…” मैंने कहा, “आज नहीं, कभी और लूँगा वहाँ भी।”
तीसरी बार सुबह चार बजे। वो मेरे ऊपर बैठ गई खुद। लंड पकड़कर अपनी चूत में बैठाया। धीरे-धीरे बैठती गई जब तक पूरा अंदर नहीं हो गया। फिर खुद उछलने लगी। स्तन मेरे मुँह के सामने आ-जा रहे थे। मैं दोनों हाथों से गांड पकड़कर ऊपर-नीचे कर रहा था। वो झड़ते-झड़ते मेरे सीने पर गिर गई। मैंने पलटकर फिर ऊपर से चोदा जब तक दूसरी बार नहीं निकल गया अंदर।
सुबह आठ बजे उठे। बिस्तर खून और पानी से गीला था। उसने शर्म से चादर ओढ़ ली। मैंने कहा, “नहा लो, कपड़े धो लूँगा बाद में। ऑफिस जाना है दोनों को।” नहाते समय बाथरूम में मैंने उसे दीवार से लगाकर फिर से चोदा। खड़ी चुदाई। एक टाँग उठाकर। पानी गिरता रहा दोनों पर।
ऑफिस पहुँचे तो वो मेरे से दो डेस्क दूर बैठी। आँखें मिलाती तो लाल हो जाती। लंच में मैंने मेसेज किया — “रात को घर आना है क्या?” उसने कुछ देर बाद रिप्लाई किया — “सर… अगर आप कहें तो…”
उस रात फिर आई। और उसके बाद कई रातें। कभी ऑफिस के स्टोर रूम में जल्दी चुदाई हो जाती जब सब चले जाते। कभी कार की पिछली सीट पर। उसकी चूत अब इतनी आदी हो गई थी कि बिना चुदे रह नहीं पाती थी। कभी-कभी ऑफिस में पैंटी नहीं पहनती, बस स्कर्ट में आती और मेरे केबिन में आकर डेस्क के नीचे बैठकर लंड चूस लेती।
एक महीने बाद उसने कहा, “सर, मैं गर्भवती तो नहीं हो जाऊँगी न? आप हमेशा अंदर ही करते हो।” मैंने कहा, “गोली खा लिया कर। और अगर हो भी गई तो देख लेंगे।” वो हँस दी।
अब वो मेरी ऑफिस वाली गुप्त माल है। बाहर से सिंपल असिस्टेंट, अंदर से रात भर चुदने वाली कुंवारी जो अब कुंवारी नहीं रही। हर शुक्रवार रात मेरे फ्लैट में बीयर, नंगी बदन, और सुबह तक चुदाई। कभी मैं थक जाता हूँ तो वो ऊपर बैठकर खुद मजा लेती है, चूत से पानी गिराती है मेरे पेट पर।
ये कहानी तब की है जब एक शर्मीली नई लड़की मेरे नीचे आई और एक बारिश वाली रात में अपनी कुंवारी चूत मेरे लंड के हवाले कर दी। अब वो कहती है, “सर, अच्छी बात हुई उस दिन मैं रुकी। नहीं तो आज तक कुंवारी ही रह जाती।”
मैं मुस्कुराता हूँ, और और कहानी यहीं खत्म होती है
