दोस्तों, मेरा नाम विक्रम शर्मा है। लखनऊ के गोमती नगर में रहता हूँ। एक प्राइवेट इंश्योरेंस कंपनी में एरिया मैनेजर हूँ। दिखने-दिखाने में सामान्य आदमी हूँ — पाँच फुट नौ इंच, जिम की वजह से बॉडी ढीली नहीं है। लंड सात इंच के करीब है।
पत्नी का नाम निशा है। उम्र पच्चीस। कानपुर की है। रंग सांवला, आँखें बड़ी काली, होंठ मोटे और हमेशा थोड़े गीले से लगते हैं जैसे अभी कुछ खाकर आई हो। कद पाँच फुट दो इंच। फिगर छत्तीस-अट्ठाईस-अड़तीस। शादी से पहले भी स्तन भारी थे, शादी के बाद मैंने इतना दबाया-मसला कि और निकल आए। निप्पल बड़े और गहरे भूरे हैं। कमर पतली है और गांड भारी, गोल, बाहर को निकली हुई। जब चलती है तो दोनों चूतड़ ऊपर-नीचे होते हैं जैसे कोई जानबूझकर राह चलते लोगों का लंड खड़ा कर रही हो। साड़ी हो, सूट हो या जींस — गांड छिपती नहीं। मैं जब उसको शादी के लिए देखने गया था तब सबसे पहले उसकी गांड ने फैसला करवा दिया था।
शादी से तीन महीने पहले हमने पहली बार कानपुर के एक ओयो में सेक्स किया था। उस रात मुझे लगा था कि निशा कुंवारी है। चूत इतनी टाइट थी कि सुपाड़ा घुसते समय उसने दाँत भींच लिए थे और चादर भींच ली थी। थोड़ा खून भी निकला था। मैंने पूछा तो वो रोते-रोते बोली कि मैं उसका पहला मर्द हूँ। मैं पागलों की तरह प्यार करने लगा। आज मुझे पता है कि वो झूठ था। खून शायद नाखून या जोर के धक्के से था, कुंवारीपन से नहीं।
लेकिन उस समय मैं दीवाना था। डेढ़ साल की डेटिंग में मैंने उसको कई बार चोदा — ओयो, गाड़ी की पिछली सीट पर, एक बार उसके मायके की छत पर रात के बारह बजे। जब भी गांड मारने को बोलता, वो जोर से मना कर देती थी और कहती थी कि उस जगह नहीं दर्द होगा, मैं भी कितना भोला था कि उसकी हर बात मान लेता था। अब पता चला वो जगह पहले से किसी और के नाम थी।
निशा के पापा नहीं हैं, जब वो ग्यारह साल की थी तब चले गए। मम्मी और एक छोटी बहन के साथ कानपुर के पुराने मोहल्ले में रहती थी। दोस्ती लड़कों से ज्यादा थी। कॉलेज घर से जाती थी, लेकिन देर से लौटती थी। मैंने कभी ज्यादा नहीं पूछा। गलती यही रही। जो आदमी अपनी औरत के पुराने दोस्तों की लिस्ट नहीं माँगता, वो एक दिन खिड़की के बाहर खड़ा होकर अपनी बीवी की गांड किसी और की जीभ पर देखता है।
ये घटना तब की है जब शादी को लगभग छह महीने हुए थे। रक्षाबंधन के आसपास हम निशा के मायके गए हुए थे। तीन रात रुकने का प्लान था। पहला दिन सामान्य रहा — रिश्तेदार, मिठाई, निशा की मम्मी का प्यार। निशा ने उस दिन पीली साड़ी पहनी थी, गांड पर इतनी कसी हुई कि बैठते समय कपड़ा चूतड़ के बीच में घुस जाता था। मैंने एक बार किचन में जाकर पीछे से उसकी गांड दबानी चाही तो उसने कोहनी मारी और कहा, “यहाँ नहीं विक्रम, मम्मी है।” हँस दी। उस समय मुझे कुछ नहीं अटका।
दूसरे दिन दोपहर के बाद निशा के फोन पर कॉल आया। वो रसोई में चली गई और दरवाजा लगभग बंद कर लिया। आवाज धीमी थी लेकिन हँसी साफ आ रही थी। जब लौटी तो उसके गाल गुलाबी थे। बोली, “विक्रम, सिद्धू आया हुआ है। बचपन का दोस्त है, निशा उसको धर्म-भाई मानती हैं। रक्षाबंधन पर राखी भी बाँधती थी। आज शाम उसको मिलना है, तुम भी चलोगे?”
सिद्धू यानी सिद्धार्थ मिश्रा। उम्र तीस के करीब था। निशा के पड़ोस में रहता था जब वो छोटी थी, दोनों साथ में खेलते थे। फिर उसका परिवार दिल्ली शिफ्ट हो गया, वो इंजीनियरिंग करके वहीं काम करने लगा। अब दो हफ्ते की छुट्टी पर घर कानपुर घूमने आया हुआ था। मैंने कहा ठीक है, चल लेना। लेकिन अंदर ही अंदर हल्का अजीब लगा क्योंकि निशा का चेहरा फोन के बाद वैसा चमक रहा था जैसा शादी से पहले वीडियो कॉल पर चमकता था जब हम दोनों नंगे हो जाते थे।
शाम को हम उसके घर पहुंच गए। छोटा सा दो मंजिला मकान, नीचे सिद्धार्थ की माँ रहती हैं, वो भी देखने मैं ख़ूबसूरत दिखती है देख के उनको लगता है कि उनकी उम्र अभी चालीस साल के ऊपर की नहीं है। सिद्धू का ऊपर पुराना कमरा है जो अब वो छुट्टियों में इस्तेमाल करता था।
घर पहुंचे तो गेट पर सिद्धार्थ मिला। छः फुट के करीब, सांवला, जिम जाकर बॉडी अच्छी बनाए हुई थी, बाईं बाजू पर काला टैटू। निशा को देखते ही उसने हँसकर गले लगाया। गले लगते समय उसका एक हाथ निशा की कमर से फिसलकर ठीक गांड के ऊपरी गोल हिस्से पर चला गया और एक पूरा सेकंड दबाया। निशा हिली नहीं, उल्टे उसके कंधे को थपथपाया। मैंने देखा और मुस्कुराकर अनदेखा कर दिया। इंसान वही गलती करता है जो वो अपनी पत्नी पर शक करना नहीं चाहता।
अंदर चाय-नाश्ता हुआ। फिर सिद्धार्थ अपनी बातें करने लगा, बिल्डिंग, काम, छुट्टियाँ। निशा उसके हर बात पे हँस रही थी जैसे कोई पुराना प्रेमी सालों बाद मिले हो। उनके बीच नजरें मिलती थीं और टूटती नहीं थीं। आधे घंटे बाद निशा उठी, “मैं रोशनी से मिल के आती हूं,” रोशनी मेरी पत्नी की सहेली है, लेकिन वो ज्यादा उस से बात नहीं करती कभी कभी जब यहां आती है तो जाकर मिल लेती है।
तुम बैठे रहो विक्रम मैं बस मिल के आई।” सिद्धार्थ तुरंत बोला, “अंधेरा हो रहा है, मैं भी साथ चलता हूं यहां वैसे कुत्ते बहुत है।” मैने कहा, “तो ठीक है मैं साथ चल जाता हूं।”
निशा ने मेरी तरफ देखा, आँखें बड़ी करके, “तुम यहीं रहो, मम्मी अकेली हैं। हम जल्दी आ जायेंगे।” मेरी तरफ मासूमियत से देखते हुए कहा। सिद्धार्थ की मम्मी टीवी पर सीरियल देख रही थीं। चाय की चुस्की लेते हुए।
मैने कहा, “थी है, जल्दी आना – घर भी जाना है”
निशा: “थोड़ा टाइम लगेगा बस गई और आई” स्माइल करते हुए बोली।
वो दोनों घर से निकले लेकिन मुझे देख के लग नहीं रहा था, कि ये दोनों की किसी से मिलने जा रहे है। बाहर निकालते ही पीछे मुड़ के देख तो उन दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा हुआ था।
मैं भी उनके पीछे पीछे निकल गया देखने के लिए कि ये कहा जाते है। वैसे रोशनी का घर तो बस एक गली दूर ही था।
वो दोनों एक दूसरे में हाथ डाले घर पहुंच गए। मकान ऐसे बना है कि एक साइड पुराना मकान है, और दूसरे साइड नया बना हुआ है। पुराने मकान मैं बस समान पड़ा हुआ है। और वहां कोई आता – जाता नहीं है मैने देखा दोनों इधर उधर देखे और जल्दी से सीडी चढ़ गए।
मैं भी बिना आवाज किए सीढ़ियों से ऊपर आगया। पहली मंजिल के गलियारे में एक खिड़की थी, पर्दा सफेद लगा हुआ था, अंदर की बल्ब की रोशनी से परछाई नाच रही थी। मैंने साँस रोककर पर्दा एक अंगुली से हटाया।
देखा कि सिद्धार्थ मेरी पत्नी को दीवाल से लगाए उसके होठों को चूस रहा है। और निशा का हाथ सिद्धार्थ के लंड पे घूम रहा था। दोनों एक दूसरे के बाहों में बाहें डाल के खोए हुए थे।
पहले तो बहुत गुस्सा लगा कि मैं अभी अंदर जाकर दोनों को रंगे हाथों पकड़ लूं। लेकिन फिर सोचा कहीं ये दोनों मुझे ही न गलत ठहरा दे। तभी निशा की आवाज आई, “आह्ह… सिद्धार्थ जल्दी करो।”
सिद्धार्थ ये सुन के निशा को दीवाल की तरफ मुंह कर दिया। और उसके पीछे घुटनों के बल बैठ गया। निशा की काली लेगिंग और पैंटी दोनों एक साथ घुटनों तक उतार दी। उसकी नंगी गांड सिद्धार्थ के चेहरे के बिलकुल सामने थी — पसीने से हल्की गीली, दोनों गोलाई को सहलाया। गाँड के बीच की दरार गहरी थी और छेद गहरा भूरा।
सिद्धार्थ दोनों हाथों से उसके कूल्हे पकड़कर फैलाए हुए था और जीभ से उसके गांड के छेद को चाटने लगा। जैसे कोई कुत्ता थाली साफ कर रहा हो। कभी जीभ छेद के आस पास चाटता, कभी नीचे सरककर चूत की गुलाबी लिपों तक चली जाती, दोनों लिपें खोलकर बीच में जीभ फेरता, फिर वापस गांड पर आ जाता। निशा एक हाथ पीछे किए उसके बाल पकड़े हुए थी और दबी आवाज में सिसक रही थी, “आह… सिद्धू… धीरे रे… कोई आ जाएगा… पागल…जल्दी कर…”
सिद्धार्थ मुँह हटाए बिना बोला, आवाज गांड में घुसी हुई थी, “तेरा पति घर पे बैठा साला चाय पी रहा होगा और तू यहाँ गांड चटवा रही है। शादी के बाद पहली बार मिली है साली, इतनी जल्दी नहीं जाने दूँगा?” निशा हँसी, वो हँसी कांपती हुई निकली, “चुप कर। चार महीने बाद मिला है तू। तेरी जीभ की आदत पड़ गई थी ना मेरे को। मेरा पति तो बस चोदता है। अगर तेरे जैसा चाटता तो कितना मजा लेती।”
मेरे पैर काँप गए। चार महीने — यानी शादी के दो महीने बाद भी ये सिलसिला रुका नहीं था। शादी से पहले तो और भी चला होगा। मैं खिड़की के फ्रेम को पकड़े खड़ा रहा। और लंड को पैंट के ऊपर से सहलाता राहा। शर्म आ रही थी उस खड़े लंड पर भी। मैं सोचता रहा कि शायद मैं चाटता और करता तो ये नहीं देखना पड़ता।
सिद्धार्थ उठा और निशा को घुमाया। दोनों का मुँह चिपक गया। जीभ फिर से अंदर-बाहर, होंठ चूसे जा रहे थे जैसे कोई फल खा रहे हों। सिद्धार्थ के दोनों हाथ निशा की नंगी गांड पर घूम रहे थे, उंगलियाँ दरार में धँसी हुईं। एक उंगली गांड के छेद में घुस दी, दूसरी चूत को सहलाने लगा। निशा के मुँह से आवाज निकली लेकिन किस नहीं छोड़ा।
कुर्ती ऊपर उठा के, सिर से होते हुए निकाल दी। अंदर लाल ब्रा थी, स्तन ब्रा से बाहर को गिरे हुए। सिद्धार्थ ने ब्रा ऊपर खींच दी, दोनों निप्पल हवा में आ गए। मुँह लगाया एक पर, जोर से चूसा, दाँत से हल्का काटा भी, दूसरी तरफ गया। निशा की पीठ कमर से धनुष हो गई। वो उसके सिर को अपने सीने से चिपकाए हुए थी, “मेरे दूध पी ले… जोर से पी… शादी के बाद किसी ने ऐसे नहीं पीए मेरे… विक्रम दबाता है बस, पीता नहीं इस तरह…”
ये सब सुन के मैं सोचने लगा। ये सब मैं कियों नहीं किया और सोचता रहा, कि मेरे पत्नी को अच्छा नहीं लगेगा। और निशा को यही पसंद आरहा था। मैं अपने आप को कोसने लगा माधरचोद ये सब क्यों नहीं किया मैंने।
दस मिनट से ज्यादा दूध चूसने के बाद। निप्पल काले-लाल हो गए, भीगे हुए। फिर सिद्धार्थ ने अपनी जींस की चेैन खोली, और एक साथ जींस अंडरवियर नीचे कर दिया। निशा खुद तुरंत घुटनों के बल बैठ गई जैसे ये सब रोज का हो। लंड को पकड़ लिया बैठते ही। मेरा अनुमान से उसका लंड जायदा बड़ा नहीं लग रहा था मेरे से भी छोटा था, लेकिन उसका सुपाड़ा मोटा लग रहा था।
निशा ने उसे दोनों हाथों से सहला रही थी, अपनी नाग आगे करके उसे सूँघा, फिर जीभ सुपाड़े के छेद पर फेरी होंठों से सुपाड़ा घेरा और चूसने लगी जैसे आम की गुठली वाला सिरा चूस रही हो। कभी पूरा सिर मुँह में लेती और गले तक ले जाने की कोशिश करती, कभी सिर्फ जीभ से नीचे तक नस के ऊपर लीक करती।
सिद्धार्थ उसका सिर पकड़कर धीरे-धीरे मुँह में धकेलने लगा। निशा की आँखें नम हो गईं, काजल थोड़ा फैल गया, लेकिन वो रुकी नहीं। गल-गल, घप-घप की आवाज आने लगी। लंड पर उसकी लार की तार लटक रही थी। सिद्धार्थ बोला, “शादीशुदा औरत बन गई है तू, लंड चूसना वैसा ही है जैसे पहले चुस्ती थी। उस समय भी तेरी आँखों में पानी आ जाता था और तू छोड़ती नहीं थी।”
निशा ने लंड मुँह से निकाला, बिना लार पीछे हुए, साँस ली और बोली, “तेरा ही तो सिखाया हुआ है ना। तू जबरदस्ती सिखा गया था उस समय और देख अभी भी इसकी आदत शरीर नहीं छोड़ रही है। विक्रम तो ये सब करने के लिए बोलता ही नहीं जो मुझे पसंद है।”
ये सुनकर मैने पेट की चैन खोली और लंड बाहर निकाल के मूठ मारने लगा। अपनी निशा को देखते हुए।
कुछ देर निशा के चूसने के बाद, सिद्धार्थ ने निशा को उठाया। लेगिंग और पैंटी निकाल कर एक तरफ फेंक दी। फिर से दीवार की तरफ खड़ा किया, हाथ दीवार पर टिकाए हुए। थूक अपने लंड पर लगाया, गांड की दरार पर रगड़ा, सुपाड़ा छेद पर रखा। निशा तुरंत बोली, आवाज फटी हुई, “गांड मत ले आज सिद्धू। घर देर होगी जाने में, विक्रम को कहीं शक न लग जाए। चूत में डाल, जल्दी निपट जा। कल मिल लेंगे फिर।”
सिद्धार्थ हँसा, पेट उसकी गांड से लगा, “तेरी चूत तो रोज तेरा पति मारता होगा लखनऊ में। गांड तो मेरी है सालों से।”
फिर भी निशा जिद पर अड़ी रही। उसने खुद पीछे हाथ ले जाकर लंड पकड़ा और अपनी चूत के मुँह पर लगाया। “अंदर डाल दे…”
सिद्धार्थ ने एक धक्का मारा आधा अंदर घुसा गया। निशा की साँस फूटी, “आह्ह्ह… मोटा हो गया है तेरा… दिल्ली में क्या खाता है…” दूसरा धक्का और पूरा लंड चूत में गायब हो चला गया। सिद्धार्थ ने दोनों दुध पीछे से पकड़ लिए, निप्पल मरोड़े और पेलने लगा।
दीवार पर निशा की हथेलियाँ फिसल रही थीं। हर धक्के पर गांड सिद्धार्थ के पेट से टकराती — थप थप थप, भारी मांस की आवाज आने लगी। निशा दबी आवाज में गाली भी दे रही थी और बोल भी रही थी, “जोर से मार… और अंदर… माधरचोद वही जगह दबा… हाँ वहीं…चोद…”
पांच मिनट दीवार से सटकर चुदाई हुई। निशा की जांघें काँपने लगीं थी। सिद्धार्थ ने लंड निकाले बिना उसको खींचकर घोड़ी बना दिया। गांड ऊपर की कमर नीचे। और दोनों हाथ कमर के दोनों तरफ पकड़कर पेलने लगा जैसे कोई मशीन हो। निशा की गांड हर धक्के पर काँपती, फैली, वापस बैठती।
सिद्धार्थ ने एक हाथ से गांड का एक पूरा लोई मसल दिया, दूसरे हाथ की उंगली गीली चूत से निकालकर गांड के छेद पर घुमाने लगा, गोल-गोल, फिर दबाव दिया। निशा चीख पड़ी, “उंगली मत डाल… घर जाना है मुझे… दाग पड़ जाएगा…”
सिद्धार्थ नहीं माना। उसने उंगली अंदर घुसा दी। निशा की कमर काँपी जैसे करंट लगा हो। “साली, शादी के बाद गांड कितनी बार मरवाई अपने पति से?” निशा ने देर से जवाब दिया, साँस तोड़-तोड़कर, “तेरे बाद सिर्फ विक्रम मेरी चूत ही मारता है… शायद उसको गांड मारने में मजा नहीं आता…” सिद्धार्थ बोला, “इस लिए मुझ से मरवाती है, अपनी गांड।”
निशा ने बस अपना सिर हिलाया, और कुछ बोलती उतने मैं सिद्धार्थ ने लंड चूत से निकाला। चूत से उसकी और निशा का पानी टपका। थूक लंड और छेद पर लगाया। और गांड के छेद पर सुपाड़ा रखा। एक झटका मारा। सिर्फ सुपाड़ा अंदर घुस गया। निशा चिल्लाई, “माधरचोद… मैने मना किया था न गांड नहीं मारना।”
इतने में सिद्धार्थ ने दूसरा झटका मारा — आधा लंड घुस गया। निशा के हाथ कांप गए, “निकल जा… दर्द हो रहा है सिद्धू… प्लीज आज छोड़ दे… कल दे दूँगी…जितना मन करे कर लेना…”
सिद्धार्थ रुकने वाला नहीं था। धीरे-धीरे, दाँत भींचकर पूरा तेज धक्का मारा और अंदर पूरा अंदर चला गया। फिर रुक गया, अंदर ही अंदर लंड घुमाने लगा गोलाई में। “आह्ह्ह… भड़वे माधरचोद मेरी गांड फाड़ दिया तूने…”
दो-तीन मिनट बाद निशा की सिसकारी की टोन बदल गई। दर्द वाली नुकीली आवाज गहरी हो गई। वो खुद गांड पीछे की तरफ धकेलने लगी, छोटी-छोटी।
सिद्धार्थ गाली देने लगा — छिनाल, रांड, पति के बिस्तर से उठकर मेरे लंड की दीवानी, शादी का सिंदूर लगाके गांड मरवाने वाली। निशा जवाब में पूरे वाक्य नहीं बना पा रही थी, सिर्फ टुकड़े निकल रहे थे, “चोद… गांड मार माधर चोद… आज निपटा दे… धीरे नहीं… अब तेज डाल…”
दस-बारह मिनट गांड की चुदाई चली। सिद्धार्थ के पेट पर निशा की गांड की छाप सी लग रही थी। फिर वो जोर से अंदर धँसा, कमर अकड़ गई, और वहीं गांड में झड़ गया।
लंड अंदर फड़फड़ाया, कई बार। निकालते समय गाढ़ा सफेद लंड के साथ छेद से बाहर आने लगा, एक लकीर जांघ तक बह गई। निशा वहीं घोड़ी बने पड़ी रही। साँस फूल रही थी, गांड खुली हुई, छेद हल्का खुला और रस नीचे गिर रहा था, जैसे कोई दरवाजा अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ हो। दोनों एक दूसरे को देख के स्माइल कर रहे थे और हांफ रहे थे।
निशा: “अब चलते है कहीं विक्रम को शक हो गया तो फिर ऐसे नहीं मिल पाएंगे।” दोनों ने जल्दी से कपड़े पहने मैने भी जल्दी से लंड ठीक किया। और जल्दी से विक्रम के घर पहुंच गया।
घर जाते ही देखा तो उसकी मम्मी अभी भी टीवी देख रही थी। मैं उनके पास जाकर बैठ गया और टीवी देखने लगा।
उन्होंने पूछा, “कहां चले गए थे बेटा।” “कहीं नहीं बाहर टहल रहा था।” मैने कहा। उनकी नजर मेरे पे घूम रही थी। जब मुझे पता चल कि मेरा लंड पैंट से साफ दिख रहा है। तो मैने तकिया लेकर लंड पे रख लिया, वो देख के मुझे हंस पड़ी और टीवी देखने लगी।
दस मिनट बाद दोनों आए वो दोनों खुश लग रहे थे। निशा अब चलते है कभी देर हो चुकी है।
मैने थोड़ा सा अच्छा चेहरा बना के बोला, “ठीक है चलते है।” सिद्धार्थ और निशा एक दूसरे को देखे और मैं और निशा बाहर निकल गए।
रास्ते भर मुझे निशा घिन आ रही थी और सिद्धार्थ पे तो इतना गुस्सा की पूछो मत लेकिन मैं अपने आप को शांत कर रहा था। मैंने तय किया कि अब आगे इनको मैं मजा दिलवाऊंगा इन दोनों को छोडूंगा नहीं।
निशा: “क्या सोच रहे हो यार? कुछ बोल भी नहीं रहे हो आंटी ने तो कुछ नहीं कहा न।” ये बोलते हुए उसने मेरा हाथ पकड़ना चाहा। लेकिन उस से पहले ही उसका हाथ हटा दिया, “सोच रहा था। एक हफ्ते और रुकते है।”
ये सुनके निशा खुश हो गई, “मैं भी सोच रही थी थोड़े दिन और रुकते है फिर चलेंगे फिर पता नहीं कब दोबारा आएंगे।”
घर पहुँचा तो मेरी (सास) मम्मी पूछ रही थीं कहाँ इतनी देर घूम आए।
निशा: “मम्मी वो सिद्धार्थ के घर गए थे, और वहीं लेट हो गया।”
फिर हमने खाना खाया और सोने चले गए सोते टाइम निशा मुझ से चिपक से सोना चाहा। लेकिन मैने उसको दूर कर दिया, “क्या हुआ है यार… ऐसे मुझ से क्यों भाग रहे हो। रास्ते में भी मुझे पकड़ने नहीं दिया। और अब भी। अगर कोई गलती हुई हो तो सॉरी बाबा…” और फिर से पकड़ना चाहा।
मैने फिर से दूर करते हुए कहा, “सोने दो और तुम भी सो जाओ अब काफी रात हो चुकी है।”
दूसरी तरफ मुंह करके मैं सोने लगा। वो भी अपना मुंह दूसरी तरफ कर ली और सोने लगी। मेरा दिमाग घूम रहा था अब क्या करूं कि इन दोनों को सबक सिखा सकूं। फिर मेरे दिमाग मैं एक प्लान आया।
ये कहानी मेरे लिए उस शाम खत्म नहीं हुई। बल्कि उस शाम से शुरू हुई थी बदले की कहानी।
अगर ये कहानी अच्छी लगी हो तो अपना फ़ीडबैक देना न भूले। आगे लिखने में मुझे और अच्छा लगेगा। editor@after-dark-tales.com
Happy reading—and enjoy the dark.
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