निशा का मायके — और टीवी पर पोर्न

दोस्तों, पहली कहानी में खिड़की के बाहर खड़ा होकर मैंने कैसे निशा की गांड किसी और की जीभ पर देखी थी, चूत में लंड जाते देखा था — वो हिस्सा यहाँ पढ़ो। निशा का मायके, और उसकी गांड

पिछली कड़ी में सास का हाथ कैसे थामा, बाथरूम में खड़ा लंड कैसे दिखाया, साड़ी के ऊपर जांघ से चूत तक हाथ कैसे फेरा — निशा का मायके — और सास की जवानी

फिर सिद्धार्थ के घर पहुँचा। उसकी माँ को कैसे चोदा, वो अब आगे जानेंगे…

in English: Nisha’s Maternal Home — And Porn on the TV

हॉल में आकर देखा तो आंटी रिमोट खोज रही थीं। झुकी हुई थीं सोफे के किनारे, साड़ी का पल्लू कंधे से सरक आया था, टीवी पर चुदाई का सीन चल रहा था जो मैंने पेनड्राइव में सेट किया था — एक लड़की घोड़ी बनी हुई, पीछे से मर्द उसको पेल रहा था, गांड पर थप्पड़ मार रहा था और चोद रहा था, हर धक्के पर मांस काँप रहा था, लड़की चिल्ला रही थी “आह मार… और अंदर…चोद…” आवाज पूरे हॉल में गूँज रही थी। मैंने जानबूझकर बाथरूम का दरवाजा जोर से खोला ताकि वो पलटें।

मुझे देखते ही उनके चेहरे का रंग उड़ गया। हाथ हवा में रुक गया। मैंने पहले टीवी देखा, फिर उनकी तरफ। वो कुछ बोलतीं उससे पहले मैंने कहा, आवाज हल्की हँसी में लपेटकर, “क्या बात है आंटी, इस उम्र में भी ये सब देख रही हैं?”

चेहरा शर्म से पूरा लाल। गला सूख गया, आवाज निगलने की कोशिश की। हकलाते हुए बोलीं, “बेटा… पता नहीं ये कैसे शुरू हो गया। मैं तो वहीं देख रही थी, जो हम दोनों देख रहे थे। और रिमोट भी नहीं मिल रही। इसको बंद कैसे करें अब?”

मैं सोफे के पास गया, और झुक गया, जानबूझकर उनके बिलकुल करीब। “मैं ढूँढता हूँ। नीचे गिरी होगी।” वो भी झुकीं, शायद इसलिए कि अकेली खोजतीं तो और शर्म आती।

सोफे के नीचे हाथ चलाते हुए मैंने उनका पैर छू लिया — साड़ी के किनारे के अंदर। त्वचा गर्म थी। वो हिचकीं, “बेटा उधर नहीं…” लेकिन वो उठीं नहीं। और खोजती रही।

“उधर गिरी होगी” कहते हुए मैने उनकी पीठ के पास से गुजरा। कंधे पर उंगली लग गई, ब्लाउज के कपड़े के ऊपर। नजरें मिलीं एक पल के लिए। और हम फिर से खोजने लगे, “इधर भी नहीं है आखिर कार रिमोट गई कहां।”

हम दोनों उठे न चाहते हुए भी हम दोनों के नजरे टीवी पर चली गईं जहाँ लड़की की गांड फैली हुई थी और मोटा लंड अंदर-बाहर हो रहा था। आंटी की साँसें पहले से तेज हो चुकी थीं। छाती ब्लाउज के अंदर ऊपर-नीचे हो रही थी।

मैं सोफे पर बैठ गया, टाँगें फैलाईं, पैंट में उभार छिपाने की कोशिश नहीं की। पोर्न चलता रहा। आंटी अभी भी झुकी हुई थीं एक सेकंड, फिर संभलकर खड़ी हो गईं। पल्लू सीने पर लिया। “बेटा ये सब नहीं देखना चाहिए। इसको बंद करो किसी तरह। सिद्धार्थ आ गया तो क्या सोचेगा।”

आवाज में घबराहट थी, लेकिन नजर टीवी छोड़ नहीं रही थी। लड़की अब पलटी जा रही थी, मर्द उसका मुँह पकड़कर चोद रहा था। शायद आंटी को नहीं पता था कि सेट-टॉप का पावर काट दें तो बंद हो जाएगा। या पता था और वो काटना नहीं चाहती थीं।

मैंने कहा, आवाज सामान्य थी, “करते तो सब हैं आंटी। देखने में क्या दिक्कत है। आपने भी तो किया होगा ये सब। तभी तो सिद्धार्थ हुआ न।”

उनके होठ खुले, और बंद हो गए। “बेटा वो अलग बात है। ये सब अकेले देखना चाहिए। अगर देखना ही है तो…”

बोलते हुए उनकी नजरें टीवी से मेरे लंड पर फिसलीं। पैंट में उभार साफ था, सुपाड़े की गोल शक्ल कपड़े को तने हुए धकेल रही थी। शायद वो गरम हो चुकी थी। या ऊपर से अनजान बनने की पूरी कोशिश कर रही थीं। माथे पर हल्का पसीना आ गया था।

मैंने लंड को पैंट के ऊपर से सहलाया, धीमे से, एक बार नीचे से ऊपर। उन्होंने देखा। लेकिन नजर नहीं हटाई।

मैंने कहा, “लगता है आप अकेली-अकेली देखती हैं ऐसे। इसलिए मैं बाथरूम गया तो आपने लगा के देखने लगीं।”

वो तुरंत बोल पड़ीं, आवाज ऊँची हो गई फिर दब गई, “मैं ये सब नहीं देखती बेटा। कभी नहीं देखा। पता नहीं कैसे चलने लगा। टीवी अचानक बंद हुआ, मैंने सोचा लाइट चली गई, कुछ सेकंड बाद ये शुरू हो गया। मैंने कुछ नहीं दबाया। रिमोट भी तो नहीं मिल रही।”

मेरा हाथ अभी भी लंड पर था, कपड़े के ऊपर धीमे धीमे ऊपर-नीचे कर रहा था। “बेटा ये सब मत करो मेरे सामने। तुम्हारी पत्नी है, उसके साथ करो। निशा अच्छी लड़की है। ये बंद करो किसी तरह। प्लीज।”

मैं उठा। एक कदम टीवी की तरफ। “फिर टीवी फोड़ दूँ? तब बंद हो जाएगा।”

वो घबरा गईं, हाथ आगे किए जैसे सच में मारने जा रहा हूँ। “नहीं नहीं, टीवी नहीं फोड़ना। महँगा है, सिद्धार्थ ने दिल्ली से भेजा था। इसको बंद करो बस किसी तरह।”

“बंद करना है तो रिमोट खोजनी पड़ेगी। नहीं तो बंद नहीं होगा। मैंने बटन देखे, उलझे हुए हैं।” मैं टीवी की तरफ देखता रहा। स्क्रीन पर चुदाई बदल चुकी थी — लड़की अब घुटनों पर थी, लंड मुँह में लिए हुए, आँखों में पानी, गल-गल घप-घप की आवाज स्पीकर से साफ आ रही थी।

लड़की का गला फुल रहा था। आंटी का अपना गला हिला, जैसे निगल रही हों। वो सोफे के दूसरे सिरे पर बैठ गईं। साड़ी सँभाली, घुटने मिलाए, और टीवी की तरफ देखी। इतना काफी था मेरे लिए।

मैं उनके पास आ कर — बिलकुल बगल में बैठ गया। जांघ से जांघ लगी, साड़ी के कपड़े के नीचे उनकी गर्मी मेरे पैंट पर आई। “आंटी, रिमोट आपके नीचे दब गई होगी शायद। उठिए थोड़ा सा।” हाथ उनके कुशन के नीचे ले गया, जानबूझकर उनकी गांड के पास से गुजारा। उंगली साड़ी के पल्लू और कमर की तह के नीचे गई। वो काँप गई अंदर से गर्मी महसूस हो रही थी। “बेटा… उधर हाथ मत डालो…ये क्या कर रहे हो…”

“खोज रहा हूं आंटी?” मैंने कहा, लेकिन हाथों से और अच्छे से उनकी गोलाई को दबाया। उनकी गांड नरम और भारी थी, निशा जैसी गोलाई लेकिन मांस ज्यादा था, शायद उम्र की वजह से। आंटी ने मेरा हाथ पकड़ लिया, हटाने के लिए। लेकिन पकड़ ढीली थी, जैसे बस इशारा हो हटाने के लिए। टीवी पर फिर से चुदाई शुरू हो चुकी थी, और आंटी का हाथ मेरे हाथ पर आगया उनकी अपनी गांड के ऊपर।

मैंने उनके कान के पास कहा, साँस उनकी गर्दन पर पड़ी, “बाथरूम में दस मिनट क्या कर रही थीं आंटी? माथे पर पसीना था। और आप काँप क्यों रही थी? जब बाहर आईं।”

उनका चेहरा और लाल होगया। आवाज निकली ही नहीं पहले। फिर फुसफुसाहट, “कुछ नहीं… गर्मी थी… पानी डाला चेहरे पर…” ये सब झूठ था और हम दोनों जानते थे।

मैंने उनका हाथ पकड़कर अपनी पैंट पर रख दिया — जहाँ लंड तना हुआ कपड़े को उठाए हुए था। उन्होंने तुरंत हाथ हटा लिया। और मेरी तरफ देखने लगी।

मैं टीवी को देख रहा था। मैने फिर से उनका हाथ पकड़ा उनकी उंगलियां कांप रही थी। और अपने लंड के रख दिया लेकिन इस बार अपने हाथ से उनका हाथ पकड़े रखा और ऊपर नीचे सहला रहा था।

उन्होंने बोला, “बेटा ये सब गलत है तुम्हारी पत्नी है ये सब उसके साथ करना चाहिए।”

“सिद्धार्थ और निशा को गए हुए कम से कम तीस मिनट हो गए होंगे, आपको क्या लग रहा है कहां गया होंगे।” बोलते हुए, अपना हाथ से उनके हाथ को दबाया उनका हाथ मेरे लंड को महसूस कर रहा था।

उन्होंने धीरे से बोला, “वो दोनों तो रोशनी के घर गए है, वो अक्सर वहां जाते है।”

“रोशनी के घर का बहाना है आप नहीं जानती होंगी शायद। ये दोनों पुराने मकान की पहली मंजिल पर जाते हैं। मैंने देखा है, और चुदाई करते है दोनों।”

आंटी की आँखें मींचीं, फिर खुली। “बेटा… गलत बात मत करो। निशा तुम्हारी पत्नी है। ऐसी बातें…नहीं सोचना चाहिए…”

“पत्नी अभी किसी और के लंड पर बैठने गई है आंटी। मैंने अपनी आँखों से देखा है — खिड़की से, गांड चटवाते हुए, चूत मरवाते हुए, गांड में पानी डालते हुए। आप चाहो तो उसने पूछ लेना तुम दोनों कहां गए थे, देखना दोनों के मुंह लाल हो जायेंगे। ये कहकर मैंने उनकी हथेली पैंट की चेैन पर सरका दी। उनका हाथ वहीं रुक गया जीप के पास, लेकिन खोला नहीं।

मैने जिप खोली और लंड बाहर निकाल लिया। आंटी देख रही थीं। जब मैने उनकी तरफ देखा तो वो देखकर मुँह फेरना चाहती थीं। पर फेर नहीं पा रही थीं। टीवी पर चुदाई अभी भी चल रही थी, यहाँ हम दोनों की सांसे तेज चल रही थी।

मैंने उनका हाथ अपने लंड पर रख दिया, उनका पूरा शरीर कांप गया। लेकिन हाथ नहीं हटाया। लंड की गर्मी उनकी हथेली में समा चुकी थी। उनके हाथों की गर्मी मुझे मदहोश कर रही थी। मैंने उनकी मुट्ठी बंद की और ऊपर-नीचे करने लगा। कुछ ही पल में उनकी कलाई खुद चलने लगी — जैसे सालों बाद कोई पुरानी मशीन तेल खाकर चली हो।

पकड़ कभी कसती कभी ढीली पड़ती कभी जोर से ऊपर नीचे होती। टीवी पर लड़की अपनी कमर हिला हिला के चुदवा रही थी, अब आंटी का ध्यान बँट रहा था कभी स्क्रीन पर देखती कभी हाथ पे देखती। तो कभी दरवाजे पर देखती।

मैंने धीरे से साड़ी का पल्लू हटाया। ब्लाउज के ऊपर के दो बटन खोल दिए। आंटी ने रोकते हुए कहा, “बेटा मत करो… बटन मत खोलो… अगर किसी ने देख लिया तो…” आवाज में डर था लेकिन हाथ लंड पर से नहीं हटा, उल्टे नीचे अंडकोष तक चली गई एक उंगली।

मैने किसी की परवाह किए बगैर तीसरा बटन भी खोल दिया। और ब्लाउज निकाल दिया। वो ब्रा में मेरे सामने थी उनके भारी बूब्ज बाहर आने के लिए बेकरार थे।

मैंने ब्रा ऊपर खींच दी दोनों तरफ से। दोनों दुध उछल के बाहर आ गए, बड़े बड़े। उनको धीरे से मसला। उनके मुंह से आवाज निकली, “बेटा कोई देख लेगा ऐसे मत करो।”

लेकिन मुझे रोकने की कोशिश नहीं कर रही थी बस मुँह से ही बोल रही थी। मैने अपना मुंह उनके निप्पल्स के पास ले गया। और जीभ उनके निप्पल्स पर फेरी। आंटी कांप गई उनका हाथ मेरे सिर पर आगया। मैने निप्पल्स मुँह में लेकर जोर से चूसा। “आह्ह… ये क्या कर रहे हो विक्रम… सिद्धार्थ आ जाएगा… आह्ह्ह छोड़ो…”

“आने दो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसको भी देखना चाहिए मेरी पत्नी को चोदने का अंजाम उसकी मां की चूत है।”

बोलते हुए दूसरा निप्पल भी उसी तरह चूसा और एक हाथ से दूसरा दबाने लगा। उनके हाथ की गति लंड पर तेज होगई।

मैंने अपना हाथ उनकी साड़ी के नीचे ले गया, पेटीकोट के अंदर, जांघ से होते हुए अंदरूनी हिस्से पर। आंटी की टाँगें मिली हुई थीं जैसे रोक रही हो। मैंने अपने घुटने से उनकी एक टाँग अलग की। पैंटी के ऊपर से ही चूत की गर्मी महसूस हो रही थी। फिर पैंटी के ऊपर से ही चूत पे उंगली से दबाने लगा, आंटी की कमर सोफे पर हिल गई, लंड को जोर से दबा दिया।

फिर पैंटी साइड में खींची। और उंगली चूत पर फेरा। चूत पूरी गीली थी। और गरम थी, उंगली फिसल गई दोनों लिपों के बीच। दो उंगली धीमे अंदर डाल दी।

आंटी ने धीमे से कहा मुँह से हाथ से नहीं, लंड उनकी मुट्ठी में फड़फड़ाया। मैं सोफे से नीचे उतर आया, और घुटनों पर बैठ गया।

साड़ी कमर तक समेटी, पेटीकोट उनके पेट पर मोड़ा दिया। पैंटी एक टाँग से खींचकर उतार दी, चूत सामने आ गई — होंठ थोड़े काले-भूरे जैसे, बीच से गुलाबी चमक, ऊपर क्लिट सूजा हुआ था।

मैंने जीभ फेरी नीचे से ऊपर एक लंबी लकीर से। आंटी के दोनों हाथ सोफे के किनारे भींच गए। “बेटा… अहह… मत चाटो… गंदी जगह है… सालों से किसी ने नहीं… चाटा…अहह विक्रम…”

मैंने नहीं माना। क्लिट को होंठों में लेकर चूसा, जोर से,
उनके हाथ मेरे बालों में आ गए और चूत पे दबा रही थी।

मैने चाट रहा था और उंगली अंदर बाहर कर रह था। आंटी मजे से चटवा रही थी। “आह्ह्ह… ऐसे ही बेटा और जोर से चूसो अह्ह्ह…”

मैं बगैर समय देखे। चाटता रहा, चूसता रहा, कभी गांड की दरार तक जीभ ले जाता कभी नीचे से ऊपर तक चाटता, कभी वापस क्लिट को पकड़ के चुसता जोर से। उनके कूल्हे काँपकर मेरी जीभ पर दब जाते, जब उनकी आवाज “आह्ह्ह मा…” निकलती तो मैं और जोर से क्लिट को चुसता।

कुछ देर चूसने के बाद उठा और चूत के मुँह पर सुपाड़ा रखा और ऊपर से नीचे एक बार रगड़ा।

आंटी ने आँखें खोल ली। पसीना उनके माथे से गले तक गिरा। “अंदर मत डालो बेटा… सालों से किसी ने नहीं डाला… प्लीज अंदर मत डालो… अहह मत डालना अंदर…” लेकिन उनकी कमर आगे खिसक रही थी लंड लेने के लिए। मैं समझ गया ये चाहती है मैं इनको चोदूं लेकिन ऊपर से बस मना कर रहे है।

मैने बोला नहीं चोदूंगा जैसे ही उन्होंने मेरी तरफ देख ये सुनके वैसे ही मैने सुपाड़ा अंदर धकेल दिया।

आंटी की कमर अटक गई, हाथ मेरे कंधे पर आ गए। फिर एक जोरदार धक्का मारा और पूरा फंक से अंदर चला गया — आह्ह्ह…, अंदर गर्मी ज्यादा थी, अंदर की दीवारें मुझे खींच रही थी। मैं रुका नहीं धीरे धीरे अंदर बाहर करने लगा।

चोदते हुए पूछा “बताओ आंटी, सिद्धार्थ के पापा के बाद कितने दिन हो गए चुदाई करवाए हुए।”

उन्होंने जवाब नहीं दिया। आँखें बंद थीं, होंठ काँप रहे थे। एक आवाज़ फुसफुसाहट से निकली, “बहुत… मत पूछो…” मैंने तेज पेलना शुरू कर दिया। सोफे की पुरानी स्प्रिंग हल्की कड़क रही थी, आंटी के स्तन ब्लाउज से बाहर झूल रहे थे हर धक्के पर, निप्पल मेरे सीने से रगड़ खा रहे थे। मैंने एक हाथ से दोनों को पकड़ के दबाने लगा। उनकी कराह दबी हुई निकल रही थी, “आह… धीरे बेटा… अहह कमर… धीरे… बहुत दिन बाद… फट जाएगी…आराम से कर…आह्ह…”

मैं वैसे ही चोदता रहा बाहर-अंदर, पूरा बाहर निकाल के एक बार में पूरा अंदर डाल देता। हर धक्के पे उनके मुंह से आवाज निकल रही थी, “आह्ह्ह…अह्ह्ह…”

दस मिनट या उससे ज्यादा सोफे पर ये चला। उनके अंदर पानी और मेरा पसीना मिल चुका था, आवाज चप-चप कि आने लगी थी। मैंने लंड बाहर निकाल लिया। आंटी की चूत पूरी तरह खुल चुकी थी।

उनको घोड़ी बनाना चाहा, लेकिन उनकी कमर के दर्द से वो कराह उठी। तो मैने उन्हें खड़ा किया सोफे के सहारे, और सोफे के पीछे ही झुका दिया। पीछे से साड़ी कमर तक उठाई। थूक हथेली पर लिया, और लंड पर लगाया।

फिर गांड की छेद पर सुपाड़ा पर रगड़ा गोल-गोल। आंटी ने हाथ पीछे किया, मेरी जांघ पकड़ ली। “वहाँ नहीं बेटा… दर्द होगा… सिद्धार्थ के पापा ने कभी नहीं डाला वहां… फट जाएगी… मेरी चूत में कर लो… वही डाल कर चोद लो…बेटा…”

मैने और ज्यादा उनकी गांड पे थूका और लंड से पूरी छेद पर लगाया। फिर सुपाड़ा सेट किया और, दबाव बनाया, सुपाड़ा उनकी गांड में अटक गया।

आंटी की आवाज़ निकली, “आह्ह…बेटा…मत डालो उसमें… दर्द हो रहा है…”

मैंने और थूक लगाया, एक हाथ से लंड को पूरा अच्छे से गिला किया, फिर धीमे से धक्का दिया। थोड़ा सा लंड अंदर घुस गया। आंटी ने सोफे का कपड़ा मरोड़ा, “आह्ह्ह निकालो… दर्द… विक्रम प्लीज…”

मैने उनकी कमर पकड़ी और लंड को एक जोर कर धक्का दिया लंड अंदर घुस गया बस थोड़ा सा बाहर था। और धक्के मारने लगा।

वो धक्के की वजह से आगे खिसक गई, “आह्ह…मेरी गांड फाड़ दी तूने…”

मैं और तेज तेज धक्के मारने लगा। उनकी गांड पे थप्पड़ भी मार रहा। उनकी आवाजे अब सिसकी में बदल गई थी हर धक्के में को मजे ले रही थी, “आह्ह्ह… ऐसे ही चोदो आह्ह्ह…”

मैने उनकी कमर पकड़ कर उनकी गांड को तेज तेज चोदे जा रहा था, “आह्ह बेटा… अब निकाल… कोई आ जाएगा… दरवाजा… अहह वहीं मार… वहीं…अब निकल जा…”

मैं निकलने के करीब पहुंच चुका था और तेज तेज दो चार धक्के मारे और उनकी गांड में ही झड़ गया। दोनों की साँसें और सिसकी हॉल में घूम रही थी। टीवी पर अब दूसरा वीडियो चलने लगा था।

मैंने रिमोट जेब से निकाला, टीवी बंद की और पेनड्राइव निकाल ली। आंटी मुझे हैरानी से देख रही थी। वो सही से खड़ी भी नहीं हो पा रही थी। मैंने उनका हाथ पकड़ कर सोफे पर बिठा दिया। और खुद उनके पास लेट गया।

ब्लाउज अभी भी खुला था, स्तन बाहर लटक रहे थे, साड़ी कमर पर अटकी हुई थी, पसीने से दोनों लथपथ थे। लंड नरम होकर हो चुका था, पानी से अभी भी चमक रहा था।

आंटी ने हाथ बढ़ाकर मेरे बालों में उंगली फेरते हुए फुसफुसाईं, “ये बात किसी को नहीं बताना बेटा। मैं बुढ़िया हो गई हूं, तुमने पाप करवा दिया।”

मैंने उनके निप्पल पर हाथ रखा, और धीरे से मसला, “बुढ़िया नहीं हो आप तो अच्छे अच्छे लंड को शांत कर दोगी। और ये पाप मैंने अकेले नहीं किया। आप खुद चुदवाना चाहती थी, तो मैने चोद दिया।”

आंटी: “जब सामने से अपना लंड दबवोगे, और टीवी पर वो सब चलेगा तो कैसे कोई बर्दाश्त करेगा मैं भी तो इंसान हूं।” ये सब बोलते हुए आंटी उठी और बोली अब कपड़े पहन लो अगर किसी ने ऐसे हमें देख लिया तो बहुत बदनामी होगी।

हम दोनों उठे और जल्दी से कपड़े पहन के बैठ गए अभी कुछ ही पल हुए थे कि सिद्धार्थ और निशा अंदर आए।

दोनों बहुत खुश लग रहे थे लेकिन जैसे ही पास आए दोनों की खुशी अचानक उड़ गई। निशा मुझे ऊपर से नीचे तक देखी फिर बोली घर चलते है काफी रात हो चुकी है।

मैं आंटी को देख कर स्माइल किया सिद्धार्थ ने मुझे देखा। उसके चेहरे पर गुस्सा साफ़ छलक रहा था। घर से बाहर निकल आया। पीछे पीछे निशा भी आ गई उसका मुंह लाल हो चुका था और गुस्से से मुझे देख रही थी। लेकिन कुछ कह नहीं पा रही थी।

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Happy reading—and enjoy the dark.

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