निशा का मायके — और सास की जवानी

दोस्तों, पिछली शाम खिड़की के बाहर खड़ा होकर मैंने अपनी बीवी की गांड किसी और की जीभ पर देखी थी, चूत में लंड जाते देखा था, गांड में पानी गिरते देखा था। घर आकर निशा को दूर धकेल दिया था। वो सो गई थी इस सोच में कि मैं नाराज हूँ किसी छोटी बात पर। मैं जागता रहा। बदले की कहानी उसी रात शुरू हुई।

निशा का मायके, और उसकी गांड

in English – Nisha’s Maternal Home — And Her Mother-in-Law’s Youth

अगले दिन सुबह मैंने प्लान पर काम शुरू कर दिया। निशा बार-बार मेरी तरफ देखती। चाय देते समय उंगली छू जाती, मैं हाथ हटा लेता। दोपहर को वो मेरे पास आकर बैठना चाहती तो मैं उठ जाता। रात को बिस्तर पर वो चिपकती, मैं दूसरी तरफ मुँह कर लेता। दो दिन यूँ ही निकले। निशा के चेहरे पर वो सवाल तैरने लगा जो वो पूछ नहीं पा रही थी — विक्रम नाराज क्यों है?।

तीसरे दिन दोपहर निशा अपने कमरे में लेटी हुई थी। सिर दर्द बताया था। मैं नीचे आ गया। सास टीवी के सामने सोफे पर बैठी थीं। 

उनके चेहरे से उम्र का अंदाजा लगाना मुश्किल है, उनके बदन को देख के किसी का भी लंड खड़ा हो जाए। साड़ी के नीचे कमर पतली नहीं रही, लेकिन स्तन अभी भी भारी हैं और बैठने पर जांघें फैल जाती हैं। निशा की गांड उसके माँ से आई है — ये बात मैं शादी के पहले दिन से ही जान चुका था, दोनों की गांड बिल्कुल एक जैसे है उभरे हुए शायद ये भी अपनी जवानी में खूब गांड मरवायी हुई होंगी।

सास ने मुझे देखा और रिमोट नीचे रखा। “तुम दोनों के बीच सब ठीक तो है न बेटा?”

मैंने पूछा, “किसके बीच मम्मी?”

“तुम्हारे और निशा के। मैं देख रही हूँ, तुम एक दूसरे को अनदेखा कर रहे हो। पहले तो चिपक के रहते थे।”

मैं सोफे के दूसरे सिरे पर बैठा। “कुछ नहीं मम्मी। सब ठीक है। शायद उसका पीरियड आया होगा, इसलिए ऐसे कर रही होगी।”

सास हँस पड़ीं, वो हँसी में एक हल्की थकान थी। “वो तो सब औरतों को होता है। हो सकता है तुम सही सोच रहे हो।” फिर थोड़ा रुककर पूछा, “वैसे आप ये सब मुझसे क्यों पूछ रही हैं आप?”

सास ने उदास चेहरा बनाया। “बस चिंता होती है बेटा। जब तुम दोनों को खुश नहीं देखती तो अच्छा नहीं लगता। निशा के पापा के जाने के बाद मैंने अकेली पाला है उसको। देखती हूँ कि उसकी शादी में कोई दरार न आ जाए।”

मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। हथेली गर्म और थोड़ी खुश्क थी। “ऐसी कोई बात नहीं है। आप ज्यादा मत सोचिए।”

उनकी आंखे भर आई। मैने उनकी तरफ देखा और कहा, “आप रोइए मत। मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ। और आप से भी।” आखिरी तीन शब्द जानबूझकर धीमे कहे, और उनके हाथ को दबा दिया।

सास का चेहरा एकदम लाल हो गया। हाथ पीछे खींच लिया जैसे आग लग गई हो। “ये गलत है।” आवाज काँप गई।

“क्या गलत है? मैंने तो ऐसा कुछ नहीं कहा। जिसे आप गलत समझ रही है, मैंने कुछ गलत बोल दिया हो तो सॉरी”

उनकी नजरें नीचे हो गईं। फिर धीमे से बोलीं, “सॉरी बेटा। मैं कुछ और समझ बैठी।”

मैंने फिर से उनका हाथ पकड़ लिया। इस बार उन्होंने कोई रिएक्ट नहीं किया, “आप क्या समझ बैठीं, बताइए।” हाथ को धीमे-धीमे सहलाते हुए पूछा — उंगली के पोर से कलाई तक, जैसे शिकारी अपने शिकार के तरफ धीरे – धीरे आगे बढ़ता है। उन्होंने हाथ नहीं हटाया। नजरें अभी भी नीचे थीं।

मैंने जोर देते हुए कहा, “बताइए न, आपने क्या सोचा था।” इस बार हाथ को हथेली में दबाया। उनके मुँह से एक छोटी सी “आह्ह” निकल गई। हाथ छूटा कर वो उठ खड़ी हुईं। “कुछ नहीं बेटा। बस दिमाग कहीं और चला गया था।” ये कहकर अपने कमरे की तरफ चली गईं। साड़ी के ऊपर से ही उनकी गांड हिलती हुई देख रह था। मैं तुरंत बाथरूम में घुस गया।

दरअसल ये मेरा प्लान था। उनके कमरे वाले बाथरूम का मुख्य वाल्व मैंने आने से पहले बंद कर दिया था — सोचा था जब उठेंगी तो पहले अपने बाथरूम जाएँगी, पानी नहीं मिलेगा, तो नीचे वाले बाथरूम आएँगी। इसलिए मैंने कुंडी नहीं लगाई। पैंट की चेैन खोली, लंड बाहर निकाल लिया जो बातों-बातों में पहले से ही तन चुका था, और हाथ चलाने लगा। आँखें बंद कीं। और दिमाग में सास का लाल चेहरा नाचने लगा, उनकी काँपती हथेली, साड़ी के नीचे की भारी जांघें। ये सोचते हुए अपने लंड को जोर – जोर से हिलाने लगा। हुआ भी वही जो मैने सोचा था।

अचानक दरवाजा खुला। और मैने आंखे खोली, सास दरवाजे पे खड़ी थीं। उनकी नजर सीधे मेरे हाथ और लंड पर गई। एक सेकंड दोनों एक दूसरे को देखे। फिर उन्होंने दरवाजा झटके से बंद कर दिया। मैंने जल्दी से पैंट चढ़ाई, पानी से मुँह धोया, और बाहर निकल आया। हॉल में वो अभी भी खड़ी थीं। साँसें तेज, पूरा चेहरा शर्म से लाल, हाथ साड़ी के पल्लू को मरोड़ रहे थे।

वो तुरंत बोल पड़ीं, शब्दों को जोड़ती हुईं, “सॉरी… वो… वो मेरे बाथरूम में पानी नहीं आ रहा था इसलिए अंदर आ गई। मैंने नहीं सोचा कि तुम अंदर होगे।”

मैं सोफे की तरफ चलते हुए बोला, आवाज सामान्य, “कोई बात नहीं। गलती हो जाती है।” और सोफे पर बैठ गया। उनकी तरफ मुड़ा। “अब चली जाइए, जो करना था कर लीजिए।”

मेरी बात सुनके को झेप गई, नजरें नीचे किए हुए वो बाथरूम में घुस गईं। दरवाजा बंद कर दिया। कुछ पल बाद निकलीं, बिना मेरी तरफ देखे अपने कमरे चली गईं।

मैं दस मिनट बैठा रहा। फिर उनके कमरे के दरवाजे पर खड़ा हुआ। और आवाज दी, “मम्मी, बाथरूम में क्या खराबी थी?”

वो बिस्तर पर लेटी हुई थीं, “पानी नहीं आ रहा था बेटा।”

मैं उनके बाथरूम में घुस गया, वाल्व घुमाया और पानी खोला — पानी जोर से गिर ने लगा। बाथरूम के बाहर आकर दरवाजे के फ्रेम पर खड़ा हो गया। “पानी तो आ रहा है मम्मी। आप झूठ तो नहीं न बोल रही थीं?”

वो तुरंत बिस्तर से उठीं, और बाथरूम में झाँका। सच में पानी आ रहा था। हम दोनों छोटे से बाथरूम के दरवाजे पर आमने-सामने थे। उन्होंने धीमे कहा, “मैं सच बोल रही हूँ बेटा। पानी नहीं आ रहा था जब मैं आई थी।”

“अभी तो आपके सामने है। पानी आ रहा है न? या आप जानबूझकर नीचे वाले बाथरूम में गई थीं?”

उनका मुँह खुला का खुला रह गया। “सच में बेटा, मैं झूठ क्यों बोलूँगी। पानी नहीं आ रहा था, जब मैं आई थी।”

मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनके हाथ काँप रहे थे, “देखिए, आपके हाथ काँप रहे हैं। आप झूठ बोल रही हैं।”

उन्होंने हाथ छुड़ाया, बाथरूम से निकलकर बेड पर बैठ गईं। “वो… वो मेरा हाथ झूठ बोलने से नहीं काँप रहा। किसी और चीज से काँप रहा है।”

मैं उनके पास जाकर उनके किनारे बैठ गया। आवाज धीमी कर ली, लेकिन धार तेज रखी। “तो फिर सच बताओ हाथ क्यों काँप रहे हैं। नहीं तो सब निशा को बता दूँगा — कि आप जानबूझकर बाथरूम में घुसीं थी।”

ये सुनते ही उन्होंने मेरा हाथ खुद पकड़ लिया। “प्लीज। निशा को कुछ मत कहना। वो क्या सोचेगी। प्लीज बेटा।”

“तो बताओ आपके हाथ क्यों काँप रहे हैं। सच-सच, झूठ नहीं बोलना।”

उनका सिर नीचे झुका हुआ था, और हाथ मेरे हाथ में था, उन्होंने छोड़ा नहीं। धीमे बोलीं, “वो… वो जब तुमको बाथरूम में देखा… इस वजह से हाथ काँप रहे हैं।”

मैंने अपना एक हाथ पैंट के ऊपर लंड पर रखा जो पूरा तन हुआ था। “ये देखने से हाथ काँप रहे हैं? आपने अपने पति का नहीं देखा था क्या?”

नजरें नीचे थी उनकी। आवाज नहीं निकली।

मैंने उनका हाथ पकड़ा और पैंट के ऊपर अपने लंड पर रख दिया। कपड़े के अंदर उभार साफ दिख रह था। “बताओ फिर, हाथ क्यों काँप रहे थे।”

उन्होंने हाथ हटाना चाहा। मैंने उनकी हथेली और जोर से लंड पर दबा दी। “अगर हाथ हटाया तो अभी निशा को सब बता दूंगा।”

मेरी बात सुनके उन्होंने हाथ नहीं हटाया। उनकी काँपती उंगलियों के नीचे लंड और सख्त होता जा रहा था। कपड़े के आर-पार उनकी हथेली की गर्मी महसूस हो रही थी। 

उन्होंने हिम्मत करके कहा, आवाज फटी, “बेटा… तुम्हारी भी गलती है। तुम बाथरूम बंद करके क्यों नहीं कर रहे थे?”

“आपकी बेटी करने दे तब न। उसको कब से पेलने के लिए बोल रहा हूँ। कहती है यहाँ नहीं, घर चलेंगे तब। लखनऊ में भी बहाने बनाती है।” मेरी बात सुनकर सास की आँखें बड़ी हुईं, मुँह आधा खुला रह गया।

“ऐसी बात क्यों कर रहे हो…” धीमे से उन्होंने पूछा।

मैंने आवाज और साफ की, “क्या आपके पति आपको नहीं चोदते थे क्या? तो इसमें गलत क्या बोल रहा हूँ?”

वो मेरी तरफ देखीं, फिर नजरें झुका लीं। “करते थे। लेकिन तुम ये सब बातें ऐसे डायरेक्ट नहीं बोल सकते। थोड़ी शर्म करो। मैं तुम्हारी माँ के समान हूँ।”

मैंने अपना हाथ उनकी साड़ी के ऊपर जांघ पर रखा और धीरे से सहलाते हुए कहा। “आपकी बेटी मुझे चोदने को नहीं दे रही है इसलिए मैं बाथरूम में हिला रहा था। ये बातें बोलकर मैं उनको गरम करना चाह रहा था। और शायद वो हो भी रही थी — क्योंकि अब उनके हाथ का दबाव अब मेरे लंड पर महसूस होने लगा था। पहले जो हाथ काँप रहे थे, अब लंड को महसूस कर रहे थे।”

उनकी साँसें तेज हो चुकी थीं। आँखें बंद होने के करीब थीं। “लेकिन बेटा… थोड़ा सब्र कर सकते हो। वो तुम्हारी पत्नी है। घर जाकर भी कर सकते हो ये सब।”

“घर जाकर कर सकता हूँ। लेकिन इस लंड को कौन समझाए कि कब खड़ा होना है और कब नहीं। ये तो बस चोदने के लिए खड़ा हो जाता है। देखो, अभी भी खड़ा है। अंदर जाने के लिए।” बोलते हुए साड़ी के ऊपर ही उनकी जांघों को सहलाता रहा, अंदर की तरफ, जहाँ दोनों जांघें मिलती हैं। उनकी आँखें बंद हो गईं और होंठ खुले थे।

“लेकिन बेटा… हर वक्त चोदने के लिए सोचोगे तो खड़ा तो होगा ही न…”

ये सुनकर मैं समझ गया — लोहा गरम है। एक धक्का और फिर मजे से चोद सकता हूँ। मैंने साड़ी के ऊपर ही उनकी चूत पर हाथ रख दिया। कपड़े की तहों के नीचे गर्मी महसूस हो रही थी। वो काँप गईं। मुँह से “आह्ह्ह…” निकली, साँसें पूरी तेज हो चुकी थीं। उंगलियाँ लंड पर और भी कस गईं। 

मैंने हाथ गोलाई में घुमाया, साड़ी के ऊपर से क्लिट वाली जगह पर दबाव दिया। उनके कूल्हे बिस्तर पर हल्के उठे। “आह्ह्ह…”

तभी नीचे से आवाज आई। निशा की। “मम्मी? मम्मी!”

सास की आँखें एकदम खुलीं। मेरे हाथ को अपने ऊपर से हटाया। और उठ खड़ी हुईं जैसे करंट लगा हो। साड़ी सँभाली, पल्लू सीने पर लिया, मेरी तरफ एक नजर डाली — उस नजर में डर था, शर्म थी, और वो चीज भी थी जो वो खुद को माफ नहीं करेंगी — फिर रूम से बाहर की तरफ निकल गई। “हाँ बेटा, आ रही हूँ!”

मैंने पैंट ठीक की, गहरी गहरी साँस लीं, और फिर नीचे उतर आया। निशा सीढ़ियों पर खड़ी थी। “आप कहाँ गए थे? मैं ढूँढ रही थी।”

सास मुझसे पहले बोल पड़ीं, आवाज बनाई हुई सामान्य, “वो बेटा मेरे कमरे में विक्रम था। बाथरूम से पानी नहीं आ रहा था तो उसी को दिखा रही थी… बना रहा था वो।” मेरी तरफ देखा नहीं। शर्म से गला सूख गया था।

नीचे बैठ के बातें हुईं। चाय बनी। निशा कुछ देर बाद बोली, “मैं सिद्धार्थ के घर जा रही हूँ थोड़ी देर में आजाऊंगी।”

मैंने कहा, “तो मैं भी चलता हूँ। साथ में यहाँ बोर हो जाएगा।”

निशा ने सास की तरफ देखा। “माँ अकेली हो जाएँगी आप यहीं रुक जाइए।”

सास ने तुरंत कहा, और इस बार आवाज में हड़बड़ी थी, “नहीं बेटा, जाओ तुम दोनों। मैं अकेली रह लूँगी। कोई बात नहीं।” निशा बोली, “ठीक है माँ।”

हम निकल पड़े। कुछ ही देर में हम सिद्धार्थ के घर पहुँच गए। घर में घुसते ही सिद्धार्थ ने हमको सोफे पर बिठाया और अंदर से चाय लेकर उसकी मम्मी आई। हम सोफे पर बैठे हुए चाय पीने लगे। कुछ देर बाद सिद्धार्थ बोला, “निशा, रोशनी कल आई थी। बोल रही थी अगर तुम आए तो घर लेकर आना।”

मैं समझ गया आगे क्या होने वाला है। वही पुराना मकान, वही खिड़की, वही पर्दा। लेकिन आज मैं पीछे नहीं जाने वाला था। मैंने मुस्कुराकर कहा, “ठीक है निशा, तुम जाओ मिलके आओ। मैं यहीं बैठा हूँ।”

निशा का चेहरा खिल गया। दोनों बाहर निकल गए। दरवाजे पर सिद्धार्थ का हाथ फिर निशा की कमर पर था। मैंने देखा और चाय की चुस्की ली।

सिद्धार्थ की माँ टीवी लगाए बैठी थीं। उम्र सास से थोड़ी ज्यादा लगती हैं, लेकिन बदन संभला हुआ, गले में सोने की पतली चेन, साड़ी हल्के रंग की। मैंने कहा, “आंटी, थोड़ा पानी मिल जाएगा क्या?”

वो उठीं, “हाँ बेटा, अभी लाती हूँ।” किचन की तरफ चली गईं। मैंने जल्दी से वो काम किया जो करना था — और उसी कुशन पे बैठ गया जहाँ वो बैठी थीं। टीवी का रिमोट उठाया, वॉल्यूम थोड़ा कम किया ताकि बाहर आवाज न जाए।

कुछ पल में वो पानी का गिलास लेकर आईं। मैंने गिलास लिया, और पानी पी के ग्लास नीचे रख दिया — और वो सोफे पर बैठ गई। हम दोनों टीवी देखने लगे। मैं और थोड़ा सा उनकी तरफ खिसक गया उनके पैर मेरे पैर से लग गए। वो मुझे एक बार देखी फिर टीवी देखने लगी।

मैने बोला आंटी क्या सीरियल देख रही हो कुछ मूवी लगाइये न आंटी ने चैनल चेंज किया और जिस्म 2 मूवी आ रही थी मैने बोला ये चलने दीजिए। वो कुछ नहीं बोली और देखने लगी मैं भी टांगे फैला के देख रहा था कि बोल्ड सीन आने लगे देखा तो आंटी मेरे तरफ देख रही थी मैं भी उनको देखा और फिर से नाटक करते हुए मूवी देखने लगा जैसे कुछ सब नॉर्मल हो।

वो भी देख रही थी लेकिन बार बार इधर उधर देखने लगती थी बोल्ड सीन की वजह से मेरा लंड खड़ा हो गया था और साफ पेंट पे दिख रहा था। उधर टीवी पे किसिंग सीन बेडरूम सीन देख देख के मुझे मजा आने लगा था आंटी भी कभी टीवी देखती तो कभी मेरी तरफ शायद उनको भी अच्छा लग रहा था लेकिन शर्म भी आ रही थी जो मैं बैठा था। 

तभी आंटी उठी और बोली तुम देखो बेटा मैं अभी आती हूं मैने देखा तो बाथरूम में चली गई। दस मिनट बाद वो बाहर निकली और सोफे पर बैठ गई उनके माथे पे पसीने थे। मैने लंड को उनके सामने ही रगड़ा और बोला मैं भी आता हूं बॉथरूम से। वो हँसी शायद उनको पता हो मैं कुछ करने जा रहा हूँ।

मैं उठा और और बॉथरूम के तरफ जाने लगा वो टीवी देख रही थी मैने रिमोट जेब में रख ली थी। बाथरूम के बाहर पहुंचा और रिमोट निकाल के टीवी को पेनड्राइव पे लगा दिया। और बॉथरूम में घुस गया। तभी आह्ह अह्ह्ह की आवाज आनी शुरू हो गई टीवी से मैने पेनड्राइव पे पौर्न भर रखी थी और इस लिए मैं समझ गया कि चुदाई की मूवी चलने लगी है।

मैने नाटक करते हुए जल्दी से डोर खोला और बाहर आगया मैने लंड इस तरह सेट किया था ताकि उनकी नजर उसी पर पड़े पूरा खड़ा बाहर निकलने के लिए तड़प रहा था।

अगर ये कहानी पढ़ने में मजा आ रहा हो। तो अपना फ़ीडबैक देना न भूले। मैं इंतज़ार करूंगा आपके फ़ीडबैक का आपके प्यार का। editor@after-dark-tales.com


Happy reading—and enjoy the dark.

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