निशा का मायके — और सास की चूदाई

दोस्तों, पिछली कड़ी में सिद्धार्थ के घर उसकी माँ को कैसे चोदा, टीवी पर पॉर्न चला के, निशा-सिद्धार्थ घर लौटे तो उनके चेहरे उतर गए — वो हिस्सा यहाँ पढ़ो। निशा का मायके — और टीवी पर पोर्न

हम सिद्धार्थ के घर से निकले और निशा के घर की tarav चल दिये, रास्ते भर हम दोनों चुप ही रहे। निशा का चेहरा गुस्से से तना हुआ था। वो समझ गई थी मेरे और सिद्धार्थ की माँ के बीच कुछ हुआ है — कपड़ों की गंध, आंटी की साँसें, और मेरी मुस्कान। लेकिन कुछ पुछा नहीं।

घर पहुँचे तो निशा सीधे अपने कमरे में चली गई। हॉल खाली था। सास कहीं नहीं दिखी। मैं उनके कमरे की तरफ बढ़ गया।

दरवाज़ा आधा खुला हुआ था। वो बिस्तर पर करवट लिए सो रही थीं। साड़ी कमर तक उलझी हुई, एक जांघ बाहर, गांड की गोलाई कपड़े के नीचे गोल उभरी हुई दिख रही थी। मैं धीरे से उनके पास गया, किनारे पर बैठ गया। हाथ उनकी गांड पर रखा — पहले हल्के से, फिर गोलाई सहलाते हुए, बीच की दरार के ऊपर से सहलाया।

वो झटके से उठीं, जैसे सपने से जागी हो अचानक। आँखें बड़ी हो गई, साँस अटक गई। “बेटा ये क्या कर रहे हो… अगर निशा ने देख लिया तो—”

“वो नहीं देखेगी। अपने कमरे में चली गई सोने।” मैंने हाथ नहीं हटाया। जांघ पर सरका दिया, साड़ी की तह के अंदर त्वचा गर्म थी। “देखिए कैसे खड़ा है।” दूसरे हाथ से पैंट के ऊपर लंड दबाया और उभार दिखाते हुए कहा।

उनकी नज़र लंड पर अटक गई। एक पल घूरा, फिर हाथ पकड़कर हटा दिया। “बेटा ये गलत है। मैं तुम्हारी माँ के समान हूँ। जाओ, निशा को बुला लो। खाना खाना है काफी देर हो चुकी है।” इतना कहकर बिस्तर से उठीं और कमरे से निकल गईं। साड़ी के ऊपर से उनकी गांड देखता रहा। फिर मैं उठा, लंड सँभाला, और निशा को बुलाने चला गया।

कमरे में निशा बेड पर लेटी थी, पीठ दरवाजे की तरफ करके। “चलो, तुम्हारी माँ ने खाना खाने को बुलाया है।”

“मुझे नहीं खाना। तुम जाओ।”

मैं उसके पास गया, उसका हाथ पकड़ा। “अच्छा चलो। खा के आकर सो जाना।” इस बार उसने ज़िद नहीं की। वो उठी, चेहरे पर अभी भी गुस्सा था।

नीचे खाना सास ने लगा चुकी थी। हम तीनों बैठ गए। मैं सास को देखता रहा। वो एक निवाला मुँह में लेतीं, मेरी तरफ देखतीं, फिर नज़रें झुका लेतीं। खाना खत्म हुआ तो निशा सोने चली। मैं भी पीछे पीछे रूम में आ गया। बेड पर लेटते ही वो दूसरी तरफ मुड़ के सोने लगी। कुछ देर बाद मैं भी सो गया।

कुछ दिन ऐसे ही कटे। निशा मेरे साथ ही रहती। कहीं भी अकेले नहीं जाने देती। घर लौटने का दिन नज़दीक आया।

उस शाम निशा ने कहा, “मैं सहेली के घर जा रही हूँ। मिल के आ जाऊँगी।”

“मैं भी चलता हूँ।” मैंने पुछा।

उसने सिर हिलाया। “नहीं। आप यहीं रहो। जल्दी आऊँगी।” मैंने ज़ोर नहीं दिया। दिमाग कहीं और घूम रहा था।

सास मेरी तरफ देख रही थीं। जैसे उनको पता हों, अब आगए क्या होने वाला था। निशा के जाते ही उनके माथे पर पसीना चमकने लगा। दरवाज़ा बंद होते ही वो अपने कमरे की तरफ तेज़ी से बढ़ीं। मैं भी उनके पीछे-पीछे आगया।

कमरे में घुसते ही उन्होंने पलटकर देखा। “बेटा ये गलत है। ऐसा मत करो।”

“मैंने तो कुछ किया ही नहीं। क्या गलत है?”

वो चुप हो गईं। नज़रें नीचे झुकी हुयीं थीं। मैं धीरे से उनके पास गया, औऱ हाथ पकड़कर अपनी तरफ खिंचा। उनकी छाती मेरे सीने से चिपक गई। साँसें तेज़ होने लगी। लंड उनकी नाभि पर रगड़ने लगा, कपड़े के आर-पार गर्मी महसूस होने लगी।

“छोड़ो मुझे… ऐसा मत करो…” बोल रही थीं, लेकिन पीछे हटने की कोशिश नहीं कर रहीं थी।

मैंने हाथ उनके स्तनों पर रख दिया। ब्लाउज के ऊपर से सहलाया — दोनों हथेलियों से दबाया, ब्लाउज के ऊपर से ही निप्पल तने हुए लग रहे थे, निप्पल छूते ही और सख्त हो गए।

वो काँप गई। “बेटा ऐसे मत करो… ये गलत है… मैं तुम्हारी माँ के समान हूँ…” उनके मुँह से निकल रहा था, लेकिन उनका शरीर पीछे नहीं हट रहा था। स्तन मेरे हाथ में और भर गए जैसे खुद धकेल रही थीं। मैंने अंगूठे से निप्पल घुमाए, थोड़ा सा कस के मरोड़तें हुये। उनके मुँह से छोटी आह निकली, कमर और आगे आ गई। उनकी साँसें भारी निकल रही थी।

फिर मैंने उनकी ठुड्डी ऊपर उठाई। होंठ उनके होंठों पर रख दिए। वो चुप चाप खड़ी थी। फिर निचला होंठ पकड़ कर चूसने लगा, एक सेकंड बाद उनके होंठ थोड़े और खुल गए। जीभ अंदर डाल दी — धीमे से, फिर उनकी जीभ से जीभ मिल गई। साँसें एक-दूसरे के मुँह में घुलने लगी। मैंने उनके बाल पकड़कर सिर और झुकाया, जीभ गहराई तक ले गया। किस लंबी होने लगी — कभी धीमी, कभी तेज़, एक दूसरे को किस कर रहे थे। उनके हाथ मेरे कंधे पर आ गए थे। जैसे अब वो छोड़ना नहीं चाहती थी।

मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटा दिया, और ऊपर चढ़ गया। पल्लू नीचे किया। ब्लाउज के बटन एक-एक खोलकर उतार दिए। उन्होंने ब्रा नहीं पहनी थी। दोनों स्तन बाहर लुढ़क आए — बड़े-बड़े , और भारी लटके हुए, निप्पल गहरे भूरे और तने हुए थे, नीचे की तरफ लटकते। सास ने शर्म से आँखें भींच लीं थी।

मैंने एक निप्पल धीरे से मसला। वो कराह उठीं। फिर मुँह निप्पल पे लगाया। जीभ से गोल-गोल घुमाया, धीमे-धीमे चूसने लगा, दूसरा हाथ उनके दूसरे स्तन पर रख के दबाने लगा। लंड पैंट के ऊपर उनकी चूत पर रगड़ रहा था। हर रगड़ पर उनकी कमर ऊपर उठ रही थी, कपड़े के ऊपर से ही वो दबाव दे रही थी। मैं एक स्तन छोड़कर दूसरे को चूसने लगा, उनकी सिसकी निकलने रही थी, “आह्ह… बेटा… मत… आह्ह ऐसे…” कमर और उठने लगी थी।

हाथ नीचे करके साड़ी कमर तक ऊपर की। पैंटी नहीं पहनी हुयी थी। चूत नंगी मेरे सामने थी — होंठ सूजे हुए लग रहे थे, चूत गिली हो चुकी थी। हाथ रखते ही वो हिचक गईं जैसे करंट लगा हो। उंगली दोनों लिपों के बीच फेरने लगा, क्लिट पर गोलाई से घुमाया, फिर धीमे से एक उंगली अंदर डाल दी। अंदर गरम और कसा हुआ लगा, दीवारें सिकुड़ी हुयी। अंदर-बाहर करने लगा, अंगूठा से क्लिट को रगड़ रहा था। उनके मुँह से आवाज़ फूटने लगी, जांघें काँप गई, चादर जोर से भींच ली।

मैं नीचे सरक गया। जीभ चूत पर रख दी — नीचे से ऊपर एक लंबी लकीर मारी, उनके हाथ मेरे बालों में आ गए, “अह्ह्ह…” तेज से आवाज निकली।

फिर उंगली से लिपें खोली, जीभ अंदर घुसा दी, क्लिट होंठों में लेकर चूसने लगा। उनके दोनों हाथ मेरे बालों में घूम रहे थे, चूत मेरे मुँह पर दबाने लगीं थी। मैं चाटता रहा — कभी छेद के मुँह पर जीभ घुसाता, कभी गांड की दरार तक ले जाता और चटता, वापस क्लिट पकड़कर जोर से चूसता। उनकी सिसकी टूट-टूटकर निकली रही थी, “आह्ह्ह… बेटा… वहीं… और… अहह मा…ये क्या हो…रहा है…मुझे…अह्ह्ह…” जांघें मेरे सिर को अंदर भींच रहे थे, एक लंबी सिसकी के साथ वो झड़ गईं — पानी मेरे मुंह में आगया, थोड़ा-थोड़ा रुक-रुककर। मैं रुका नहीं, चूत से मुँह नहीं हटाया बस धीमे-धीमे चाटता रहा जब तक उन्होंने बाल पकड़ कर हटाया नहीं।

फिर उठा कमीज़, पैंट, अंडरवियर एक-एक करके सब उतार दिया। नंगा सास के सामने खड़ा था। उनकी आँखें लंड पर जा टिकीं — पूरा तना हुआ, सिर पर पानी से चमक रहा था। उन्होंने अपनी टाँगें खुद थोड़ी फैला दी। जैसे अब अंदर लेने के लिए मरी जा रही हो। लंड उनकी जांघ पर रखा और धीरे धीरे रगड़ते हुए उनकी चूत के पास ले गया, चूत के मुँह पर सिर्फ़ नोक टिकाई, फिर निकाल ली, फिर टिकाई फिर निकाल ली। उनके ऊपर झुक कर स्तन मसलने लगा, लंड अभी भी चूत पे रगड़ रहा था। उनकी कमर पीछे-आगे हो रही थी, लंड अंदर लेने की कोशिश कर रही थी। लेकिन मैं अंदर नहीं डाल रहा था। बस ऊपर ऊपर लंड रगड़ रहा था।

उहोंने हाथ नीचे करके लंड पकड़ ली, आवाज़ काँपती हुई निकली, “अंदर… बेटा अंदर डाल दो… अब मत सताओ… अंदर डालो…” अपने हाथ से ही लंड को अपनी चूत के अंदर डालने को कोशिश करने लगी।

जैसे ही सुपाड़ा अंदर गया मैने एक धक्का मारा — आधा लंड अंदर चला गया। उनकी चूत कसी हुई थी जैसे सालों बाद किसी ने फिर से खोलने की कोशिश की हो, दीवारें अंदर की तरफ खींच रही थीं। फिर एक और झटका मारा — पूरा लंड अंदर घुस गया। उनकी आँखें बड़ी हो गई, मुँह खुल गया। अंदर-बाहर करने लगा। हर धक्के पर स्तन ऊपर नीचे हो रहे थे। उनकी कराह गूंज रही थी, “आह्ह… धीरे… अहह कमर… बहुत दिन बाद… आह्ह वहीं…अह्ह्ह…”

चप-चप की आवाज़ गूंजने लगी थी। उनकी दूसरी बार झड़ गई — अंदर सिकुड़न तेज़ हो गई, नाखून मेरी पीठ पर दबे, इस बार सिसकी रोक ना सकी, “अह्ह्ह… और तेज बेटा…मैं फिर से…आ रही हूं…और तेज…अह्ह्ह…चोदो…”

मैं रुका नहीं, और तेज़ तेज़ पेलने लगा। उनकी आह्ह, मेरे हर धक्के पे निकल रही थी। “आह्ह्ह… मैं आ रही हूं…अह्ह्ह…आ गई…”

इतने में दरवाज़ा खुला। मेरी नजर दरवाजे की तरफ गई।

मेरी सास चाहते हुए भी खुद को नहीं रोक सकी और उनकी चूत ने पानी छोड़ दिया। लंड सास की चूत में था। उनके चूत जो पानी छोड़ रही था। और निशा दरवाजे पे खड़ी थी। उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था। मेरी कमर अभी भी हिल रही थी। एक सेकंड दोनों देखे। उसने झटके से दरवाज़ा वापस बंद कर दिया।

सास अब रोकने लगीं, उठने की कोशिश की, “निशा ने देख लिया… उनका हाथ अपने सिर पर चला गया… मैने बहुत गलत किया… निशा…” वो बड़बड़ा रही थी।

मैं फिर भी नहीं रुका। कमर जोर से पकड़कर घुमा दिया, गांड ऊपर, चेहरा तकिए में, घोड़ी बना दी। पीछे से एक धक्का मारा और पूरा अंदर चला गया। “देख लिया है तो देखने दो। मुझे और चोदना है।” और चोदने लगा।

वो कुछ नहीं बोलीं। सिर्फ़ तकिया भींच लिया। मैं गांड के दोनों लोई पकड़कर तेज़-तेज़ पेलने लगा — पूरा बाहर, पूरा अंदर, थप्पड़ भी उनकी गांड पे मार रहा था, फिर से उनकी कमर झटके देने लगी। उनकी सिसकी तकिए में दब गई, फिर निकलने लगी, “आह्ह्ह… ऐसे… बेटा वहीं… अब निकाल मत… अहह…”

वो फिर से झड़ चुकी थी। मैं और तेज़ हुआ, दो-चार गहरे धक्के और मारे, मेरी भी कमर अकड़ गई, और उनकी चूत में ही झड़ गया — गर्म फव्वारे, अंदर ही छोड़ दिया। दोनों पसीने से लथपथ बिस्तर पर ढेर हो गए। कुछ ही देर में दोनों की साँसे समान्य होने लगी. हम दोनों एक दूसरे को देख रहे थें।

आगे क्या हुआ — निशा ने देखने के बाद क्या किया, जानेंगे अगले पार्ट में।

अगर ये कहानी पढ़ने में मजा आ रहा हो। तो अपना फ़ीडबैक देना न भूले। मैं इंतज़ार करूंगा आपके फ़ीडबैक का आपके प्यार का। editor@after-dark-tales.com


Happy reading—and enjoy the dark.

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